prashant neel, prabhas, animal director, big budget films, salaar, kgf | ‘एनिमल’ डायरेक्टर प्रशांत ने कहा – कहानी दमदार है तो बड़े बजट और बड़े स्टार की भी जरूरत नहीं पड़ेगी

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8 मिनट पहले

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मौजूदा दौर में प्रशांत नील देश के सफलतम निर्देशकों में से एक हैं। इंडिया की बिगेस्ट ब्लॉकबस्टर्स फिल्मों में से एक ‘केजीएफ’ के दो पार्ट उनके नाम हैं। अब उनकी फिल्म ‘सालार’ आ रही है। दैनिक भास्कर से हुई बातचीत में डायरेक्टर ने अपनी पसंद और कन्विक्शन जाहिर किए। पेश हैं प्रशांत नील से बातचीत के कुछ प्रमुख अंश।

आपकी ग्रूमिंग किन फिल्मों से हुई है?
जवाब- मेरी ग्रूमिंग अमिताभ बच्चन की फिल्मों से हुई है। मैं थिएटर तभी जाया करता था, जब अमिताभ बच्चन की फिल्म लगती थी, वरना मैं नहीं जाता नहीं था। उनका मुझ पर बहुत इन्फ्लुएंस है। वह मेरे साथ रह गया। मेरे किरदारों में वो 70 के दशक के जमाने का स्वैग और मिजाज रहा है। उस जमाने में जो इमोशन और ड्रामा गढ़ा जाता था, वैसा मेरी क्रिएटिविटी में झलकता है। वरना जो ड्रामा ‘अमर अकबर एंथनी’ में खून चढ़ाने वाला था, वह नरेशन के वक्त तो बड़ा अजीब लगा होगा। मगर जब वह स्क्रीन पर आया तो फिल्म का सबसे बड़ा हाईपॉइंट बना। वैसे सीन से मैं कन्विक्शन का पहलू लेता हूं, क्योंकि सिनेमा ऑडियंस को अपनी क्रिएटिविटी से बिलीव करवाने का काम है। 70 के दशक वाले वैसा तब कर लेते थे, जब VFX नहीं था। आज तो हमारे पास सब कुछ है।

सालार और आप की बाकी फिल्मों का सार ‘डर से बड़ा बोझ नहीं और हिम्मत से बड़ा हथियार नहीं’ कैसे आता रहा है?
जवाब- यह सिर्फ मेरी ही नहीं, साउथ की जो भी फिल्में मैं देखते-देखते बड़ा हुआ हूं, उन सबमें किरदारों के ऐसे थॉट अंतर्निहित होते हैं। इस तरह की सोच रखने वाला शख्स ही हीरो होता है। ये उसको आम हौसले या गुणों वाले शख्स से अलग रख सकते हैं। ये चीजें एक कमर्शियल और मास मूवीज के लिए पत्थर की लकीर की तरह कागजों पर लिखी होनी चाहिए। वरना फिल्म में ऑडियंस अपने हीरोज से आईडेंटिफाई नहीं कर पाएगी।

बारिश और मुख्य किरदारों के बचपन भी रहते हैं। ये सब कहानी के बिल्टअप के लिए जरूरी होते हैं?
जवाब- मैं ऑडिएंस को बताना चाहता हूं कि मेरा हीरो ऐसा क्यों है, जो सैकड़ों गुंडों को अकेला हैंडल कर सकता है। वह क्यों अग्रेसिव और मैड है? क्यों वह अपने दोस्त को बचाने की खातिर किसी भी हद को पार कर सकता है? वह तब संभव हो सकेगा, जब उन किरदारों के बचपन में क्या हुआ, वह ऑडिएंस को पता चल सके। ये पहलू भी 70 के दशक से आया है।

जब उस दौर की फिल्मों में हीरो वगैरह का बचपन भी दिखाया जाता था। एक कैलकुलेशन होता है कि उस किरदार ने अपने बचपन को कैसे जिया है? उसमें जूनन या लालच वगैरह के भाव क्या हैं? हालांकि ऐसा नहीं है कि मेरी हर मूवी में बैकस्टोरी हो ही। ‘सालार’ में तो मुझे हीरो और उसके दोस्त की दोस्ती को भी स्थापित करना था।

आप देश के सबसे सफल निर्देशकों में एक हैं। फ्युचर में क्या चलेगा?
जवाब- यह आपको पता हो तो बताइए, मैं भी जान लूं। प्रभास भी सदा कहते रहें हैं हर फ्राइडे कुछ न कुछ बदलता रहता है। ऑडियंस पैटर्न दर पैटर्न शिफ्ट होती रहती है। मसलन कुछ साल पहले बना कि बाहुबली पैटर्न चलेगा। फिर ऑडियंस केजीएफ पैटर्न की ओर शिफ्ट हुई। हिट फिल्म बनाने की रेसिपी या पैटर्न ढूंढने जाएंगे तो मात खाएंगे। दमदार स्टोरी, पूरे कन्विक्शन से बोलिए ऑडियंस जरूर आएगी। भले ही आपकी फिल्म किसी भी बजट की हो? या फिर फिल्म में स्टार हो या न हो? आपकी फिल्म अच्छी होगी तो ‘वर्ड ऑफ माउथ’ से भी हिट हो जाएगी। हम दर्शकों को पसंद आने वाली कहानी बनाते हैं। ताकि सब 10 और दर्शकों को बोल सकें कि अच्छी फिल्म बनी है।

केजीएफ में बंदूक की धधकती हुई नली से सिगरेट जलाने वाला सीन कैसे आया?
जवाब- रॉकी भाई का किरदार बेहद अनप्रेडिक्टेबल था। उसका अगला मूव क्या होगा, वह मैं भी नहीं जानता था। सरल शब्दों में कहूं तो वह किरदार हमारी ऊंगली पकड़ कर हमसे कहानियां और सीन लिखवा रहा था। उनकी जो अनप्रेडिक्टेबिलिटी थी, उनसे हम सरप्राइज होते थे और आगे का घटनाक्रम लिखते थे। किसी सिचुएशन विशेष में रॉकी भाई कुछ अलग स्केल पर ही रिएक्ट करेगा, वरना वह रॉकी भाई कहां? तो उस पहलू से हमें राइटिंग में मदद मिली।

क्या ‘सालार’ में भी ऐसा कुछ देखने को मिलेगा?
जवाब- जी हां। सिचुएशन विशेष में देवा क्या करेगा, वह दर्शकों की उम्मीद के हिसाब से होगा तो वो काहे का देवा। वह कितना मैडली रिएक्ट करेगा या उसका ट्रिगर पॉइंट क्या होगा, उससे चीजें तय होंगी। देवा का ट्रिगर पॉइंट बचपन से जुड़ा हुआ है। अगर किसी इंसान को बचपन में किसी चीज का डर हो तो वह बड़ा होने पर वहां जाने से हिचकेगा। जैसे मैं लिफ्ट में जाऊं तो मुझे दम घुटने सी फीलिंग आती रहती है। ऐसा इसलिए क्योंकि वहां मुझे बचपन से वैसा ही महसूस होता था। तो हमारे देवा का जो रिएक्शन है, उसके तार भी बचपन से जुड़े हैं। तभी फिल्म में बचपन का भी हिस्सा है।

‘केजीएफ’ से किस तरह ‘सालार’ बड़ा है?
जवाब- हम लोगों ने ‘केजीएफ’ से कुछ बड़ा बनाने की कोशिश नहीं की है। दर्शक ‘सालार’ को देखने इसलिए नहीं आएंगे कि उन्हें प्रशांत नील का काम जज करना है। वो बस एंजॉय करने आंएगे। बेशक वो इस भरोसे से जरूर आएंगे कि प्रशांत की फलां फिल्म रही है, जो उन्हें पसंद आई थी। वो वैल्यु उन्हें ‘सालार’ में भी मिलेगी। मेरा नाम आता है ‘केजीएफ’ से।

यह भी जाहिर है कि ‘सालार’ और ‘केजीएफ’ एक जैसी तो नहीं ही होगी?
जवाब- बिल्कुल। अगर मैं दर्शकों से कहूं कि ‘सालार’ तो ‘केजीएफ’ से बड़ी है, तो यह उन्हें गुमराह करने जैसा होगा। मैंने ‘केजीएफ’ को दिमाग में रखते हुए ‘सालार’ नहीं बनाई है। ‘सालार’ पर प्रभास ने भी खासी मेहनत की है। मेरा मानना है कि उनके कद के स्टार अपने फैंस के प्रति बहुत ज्यादा जिम्मेदारी का भाव रखते हैं। तभी यहां ‘सालार’ में उन्होंने कॉस्ट्युम से लेकर बॉडी लैंग्वेज और बाकी चीजों में सावधानी रखी।

खासकर बॉडी लैंग्वेज पर वो बहुत पर्टिकुलर रहे हैं क्योंकि उनका किरदार बड़ा साइलेंट है। एक ऐसा किरदार जो कभी भी इमोशनली फट सकता है,उसकी बॉडी लैंग्वेज कैसी होगी? इस पर हमने काफी काम किया है। उन्होंने अपनी बॉडी भी लीन की है। शूट पर जाने से पहले उनकी पूरी तैयारी छह महीनों तक चली।

ट्रोलर्स बोल रहे हैं कि कलर पैलेट में सिमिलैरिटी लग रही है। इस पर आप क्या कहेंगे?
जवाब- अब ‘केजीएफ’ भी मैंने ही बनाई है न। मैं एक खास कलर पैलेट के साथ कंफर्टेबल रहता हूं। वह मेरे अवचेतन मन में बसा हुआ है। ऐसे में कई बार यह सबकॉन्शियस लेवेल पर हो जाता है, क्योंकि आप एक खास दुनिया क्रिएट कर रहें हैं। मैं ‘सालार’ इसलिए बना रहा हूं कि ‘केजीएफ’ के जहां से दूर जा सकूं। कलर चॉइस अगर मान भी लें, मगर मैं खुले तौर पर कहना चाहूंगा कि ‘सालार’ दूर-दूर तक ‘केजीएफ’ जैसी या उससे छोटी-बड़ी नहीं है।

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