Lanka Dahan; Ramayan Ram Mandir Movies List Hanuman Film Facts History | 107 साल पहले बनी थी राम पर पहली फिल्म: मुस्लिम एक्टर अदीब सबसे ज्यादा 8 बार बने राम, जापान में बनी रामायण भारत में बैन

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16 मिनट पहले

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22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होगी। देश में राममयी माहौल है हालांकि ऐसा माहौल पहली बार नहीं है। 1980 के दौर में शो रामायण जब टीवी पर प्रसारित होता तो सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था। लोग इस सीरियल में राम-सीता बने अरुण गोविल और दीपिका चिखलिया को देखकर आज भी हाथ जोड़ लेते हैं और उनके पैर छूने लगते हैं।

बॉलीवुड में भी राम और रामायण पर आधारित कई फिल्में बनी हैं। पिछले साल रिलीज हुई 600 करोड़ रु. के बजट में ‘आदिपुरुष’ भले ही फ्लॉप रही लेकिन इससे भी ये ट्रेंड फीका नहीं पड़ा।

इसका उदाहरण हाल ही में रिलीज हुई तेलुगु फिल्म ‘हनुमान’ है जिसकी कमाई रुकने का नाम नहीं ले रही है। फिल्म ने ग्लोबली 150 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाई कर ली है जिससे साफ है कि रामायण पर फिल्म बनाने का फॉर्मूला हमेशा सुपरहिट साबित हुआ है।

यही वजह है कि 112 साल के हिंदी सिनेमा के इतिहास में रामायण पर अब तक 50 फिल्में और तकरीबन 20 टीवी शो बन चुके हैं और ज्यादातर फिल्मों ने अच्छी कमाई की है। 1917 में यानी 107 साल पहले आई लंका दहन ने 10 दिनों में ही 35 हजार रुपए की कमाई कर ली थी।

इसकी कमाई बैलगाड़ियों में भरकर प्रोड्यूसर तक पहुंचाई जाती थी, क्योंकि टिकट बिक्री में ज्यादातर सिक्के ही आते थे। 1943 में आई राम-राज्य ने भी उस दौर में 60 लाख रुपए कमाए थे। ये फिल्म महात्मा गांधी की फेवरेट फिल्मों में से एक थी।

चलिए जानते हैं माइथोलॉजिकल फिल्मों से जुड़े कुछ दिलचस्प फैक्ट्स…

अन्ना सालुंके ने 1912 में रिलीज हुई फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' में तारामती का किरदार निभाया था।

अन्ना सालुंके ने 1912 में रिलीज हुई फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ में तारामती का किरदार निभाया था।

रामायण पर बनी पहली फिल्म थी ‘लंका दहन’

पौराणिक विषयों पर फिल्में बनने का चलन भारत में 107 साल पहले 1917 में शुरू हुआ। 1917 में आई फिल्म ‘लंका दहन’ हिंदी सिनेमा में रामायण पर बनी पहली फिल्म थी। इस साइलेंट फिल्म को दादा साहेब फाल्के ने डायरेक्ट किया था जिन्होंने हिंदी सिनेमा की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई थी जो कि 1912 में रिलीज हुई थी।

दरअसल, एक बार दादा साहेब दौरे पर विदेश गए जहां उन्होंने ईसा मसीह पर बनी फिल्म देखी। इसे देखकर उन्हें लगा कि भारत में भी पौराणिक फिल्में बनाई जा सकती हैं। राजा हरिश्चंद्र बनाने के बाद उन्होंने 1913 में मोहिनी भस्मासुर और फिर 1917 में लंका दहन बनाई।

फिल्म की खास बात ये थी कि इसमें राम और सीता की भूमिका एक ही एक्टर ने निभाई थी जिनका नाम अन्ना सालुंके था। उस दौर में महिलाएं फिल्मों में काम करने से कतराती थीं इसलिए अन्ना सालुंके ने फिल्म में दो किरदार निभाए।

इसी वजह से उनके नाम हिंदी सिनेमा का पहला डबल रोल करने का भी रिकॉर्ड है। आज भी हिंदी सिनेमा के इतिहास में कोई ऐसी फिल्म नहीं है जिसमें हीरो और हीरोइन दोनों का रोल एक ही व्यक्ति ने निभाया हो। फिल्म की कहानी राम के 14 साल के वनवास से शुरू हुई थी और रावण के वध पर खत्म हुई थी।

फिल्म देखने के लिए लगती थी कई किलोमीटर की लाइन

फिल्म लंका दहन की पहली स्क्रीनिंग मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा हॉल में हुई। पर्दे पर रामायण की कहानी देखना लोगों के लिए इतना बेहतरीन अनुभव था कि लोगों ने इसे ही सच मान लिया। थिएटर के बाहर पहले टिकट खरीदने वालों की लंबी कतारें होती थीं। ये हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहली बार था जब कई किलोमीटर की भीड़ टिकट खरीदने लिए खड़ी थी। लोग सिक्कों से टॉस करके ये तय करते थे कि टिकट किसे मिलेगी। भगदड़ और टिकट की लड़ाई थिएटर के बाहर आम बात हो गई थी।

सिनेमाघरों के बाहर उतारे जाते थे जूते-चप्पल

सिनेमाघरों के बाहर जूते-चप्पल बिखरे पड़े रहते थे। लोगों ने सिनेमाघरों को मंदिर समझ लिया। लोग बिना जूतों के अंदर जाते और हाथ जोड़कर बैठते। फिल्म में पहली बार ट्रिक फोटोग्राफी और कुछ खास तरह के स्पेशल इफेक्ट इस्तेमाल किए गए थे।

राम और कृष्ण के रोल निभाकर खलील बने सुपरस्टार

1920 का दौर आते-आते माइथोलॉजिकल फिल्मों का चलन बढ़ता गया। यही वजह रही कि कई बड़े निर्माता-निर्देशक रामायण, महाभारत के प्रसंगों पर फिल्म बनाने लगे। इन्हीं फिल्मों से खलील साइलेंट और बोलती फिल्मों के पहले सुपरस्टार बने। उन्होंने 1920 से 1940 के दौर में कई पौराणिक फिल्मों में काम किया।

खलील मुस्लिम थे, लेकिन उन्होंने कई फिल्मों में हिंदू देवताओं के किरदार निभाए। खासकर राम और कृष्ण के रोल में बेहद लोकप्रिय हुए। उनकी पहली फिल्म कृष्ण सुदामा थी जो कि 1920 में रिलीज हुई थी। इसके बाद उन्होंने सती पार्वती, महासती अनुसुया, रुक्मिणी हरण, लंका नी लाडी और द्रौपदी जैसी फिल्मों में कृष्ण और राम के किरदार निभाए।

मुस्लिम होकर हिंदू देवताओं के किरदार निभाने के चलते खलील को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा था जिससे दुखी होकर उन्होंने कहा था- मैंने भगवान कृष्ण से लेकर प्रभु रामचंद्र जैसे हिंदू माइथोलॉजिकल किरदार निभाए, मैंने अपनी पूरी प्रोफेशनल लाइफ में हिंदू फिल्ममेकर्स के साथ काम किया। अब जब मैं फिल्म इंडस्ट्री में जात-पात की बात सुनता हूं तो मेरे दिल को बेहद चोट पहुंचती है। मुझे हिंदू और मुस्लिम जनता से बराबरी का प्यार मिला है। हम सब कला के भक्त हैं और कला हर धर्म से ऊपर है।

प्रेम अदीब 8 बार बने राम

1940 के आसपास बोलती फिल्मों में एक और एक्टर ने सिल्वर स्क्रीन पर राम के किरदार से काफी पॉपुलैरिटी पाई। ये थे प्रेम अदीब। उनका नाम उस दौर के टॉप फिल्म स्टार्स जैसे पहाड़ी सान्याल, अशोक कुमार, पीसी बरुआ, मास्टर विनायक के साथ लिया जाता था। प्रेम ने 25 साल के करियर में तकरीबन 60 फिल्मों में काम किया।

इनमें से 8 फिल्मों जैसे भरत मिलाप, राम राज्य, राम बाण, राम विवाह, राम नवमी, राम हनुमान युद्ध, राम लक्ष्मण, राम भक्त विभीषण में उन्होंने राम की भूमिका निभाई। 1943 में आई राम राज्य से उन्हें बेहद पॉपुलैरिटी मिली थी। इस फिल्म में शोभना समर्थ ने सीता की भूमिका निभाई थी। पांच लाख के बजट में बनी राम राज्य ने 60 लाख रुपए का बिजनेस किया था।

खलील और प्रेम अदीब के अलावा शाहू मोदक भी 1940 से लेकर 50 के दशक तक हिंदू माइथोलॉजिकल कैरेक्टर निभाने के लिए फेमस थे। उन्होंने हिंदी और मराठी की तकरीबन 29 फिल्मों में श्री कृष्ण की भूमिका अदा की थी।

राम और कृष्ण के किरदार निभाने वाले NTR को भगवान मानने लगे थे लोग

साउथ सुपरस्टार NTR ने भी पौराणिक फिल्मों में राम और कृष्ण के किरदार निभाकर खूब पॉपुलैरिटी पाई थी। यहां तक कि लोग उन्हें भगवान का दर्जा देने लगे थे। NTR को भगवान राम के किरदार में भी खूब पसंद किया गया। वो लव कुश (1963) और श्री रामंजनेय युद्धम (1974) जैसी कुछ फिल्मों में राम के किरदार में दिखे। उन्होंने 17 फिल्मों में कृष्ण की भूमिका निभाई थी।

50 के दशक में फीका पड़ा पौराणिक फिल्मों का दौर

1951-60 का दशक पौराणिक फिल्मों के लिहाज से ठंडा रहा। इस दौर में मुगल-ए-आजम, मदर इंडिया, प्यासा, कागज के फूल, दो बीघा जमीन, आवारा और दो आंखें बारह हाथ जैसी कालजई फिल्में छाई रहीं। यही वो दौर था जब बलराज साहनी, देव आनंद, दिलीप कुमार, अशोक कुमार और शम्मी कपूर की फिल्मों को टिकट खिड़की पर बेपनाह सफलता मिली।

यह वो दौर था जब सत्यजीत रे, बिमल रॉय, गुरुदत्त, महबूब खान, शांताराम, के.आसिफ, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन जैसे महान फिल्मकारों ने अपनी बनाई फिल्मों से भारतीय सिनेमा जगत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और विषयों को लेकर एक्सपेरिमेंट भी किए जिससे दर्शकों की पौराणिक फिल्मों में दिलचस्पी कम हो गई।

रामायण नहीं, संतोषी माता पर बनी फिल्म ने तोड़ दिए थे बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड

1975 में पौराणिक फिल्मों का ट्रेंड जब लगभग खत्म हो चुका था तो डायरेक्टर विजय शर्मा ने पत्नी के कहने पर संतोषी माता पर फिल्म बनाने की ठानी। विजय शर्मा के लिए ये बहुत बड़ा रिस्क था क्योंकि इससे पहले कभी रामायण, महाभारत के प्रसंगों के अलावा संतोषी माता पर कोई फिल्म नहीं बनी थी। उन्होंने अनीता गुहा को मेन रोल में कास्ट किया।

30 मई 1975 को फिल्म रिलीज हुई। इसी साल शोले और दीवार जैसी बड़े स्टार्स की फिल्में रिलीज हुई थीं। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जय संतोषी मां इन फिल्मों को न सिर्फ टक्कर देगी बल्कि 1975 में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली दूसरी फिल्म भी बन जाएगी। शुरुआत में जब जय संतोषी मां मुंबई के एक सिनेमाघर में लगी तो पहले शो में सिर्फ 56 रुपए कमाए। ये आंकड़ा दो दिनों में 100 रुपए पर पहुंचा, लेकिन 10वां दिन आते-आते सब पलट गया।

बिना किसी बड़ी स्टारकास्ट के ‘जय संतोषी मां’ ने सिल्वर स्क्रीन पर गोल्डन जुबली (50 सप्ताह) मनाई थी। फिल्म में अनीता गुहा के अलावा कानन कौशल, भारत भूषण और आशीष कुमार ने अहम रोल प्ले किया था। ‘जय संतोषी मां’ फिल्म में दिखाई जाने वाली आरती के दौरान दर्शक स्क्रीन पर पैसे फेंकते थे।

रामानंद सागर की रामायण के नाम रहा 80-90 का दशक

टीवी पर पौराणिक शो का दौर लाने का श्रेय रामानंद सागर को जाता है। उन्होंने टीवी शो के तौर पर रामायण दिखाई। दूरदर्शन पर पहली बार 87 ऐपिसोड वाली रामायण का प्रसारण 25 जनवरी 1987 को शुरू हुआ और आखिरी ऐपिसोड 31 जुलाई 1988 को लाइव हुआ था। ये सीरियल रोज सुबह साढ़े 9 बजे आता था। सीरियल में अरुण गोविल ने राम, दीपिका चिखलिया ने सीता, अरविंद त्रिवेदी ने रावण, सुनील लहरी ने लक्ष्मण और दारा सिंह ने हनुमान की भूमिका निभाई थी।

सीरियल की पॉपुलैरिटी इतनी बढ़ गई कि जब भी ये टीवी पर आता तो हर जगह सन्नाटा छा जाता था। घरों के बाहर कर्फ्यू जैसे हालात हो जाते थे। खुद रामानंद सागर को विश्वास नहीं हुआ था कि उनका बनाया सीरियल इतना ऐतिहासिक हो जाएगा।

सिगरेट पीने पर अरुण गोविल को फैन ने टोक दिया था

राम के रोल के चलते अरुण गोविल इतने टाइपकास्ट हो गए कि उन्हें फिर किसी दूसरे रोल में दर्शकों ने पसंद नहीं किया। यही वजह रही कि फिल्मों में उन्हें रोल नहीं मिले। इससे जुड़ा एक किस्सा अरुण गोविल ने खुद शेयर किया था जब वह रामायण के 33 साल पूरे होने पर पूरी टीम के साथ द कपिल शर्मा शो में पहुंचे थे।

उन्होंने बताया था कि रामायण के बाद उनकी इमेज बिल्कुल बदल गई थी। वो जहां जाते लोग उनके पैर छूने लगते थे। यहां तक कि एक बार वो सेट पर सिगरेट पी रहे थे तभी किसी ने उन्हें टोक दिया कि आप सीरियल में राम का किरदार निभाते हैं, आपको सिगरेट वगैरह नहीं पीनी चाहिए। उसके बाद से ही अरुण गोविल ने सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया।

एनिमेटेड फिल्म 'रामायण द लीजेंड ऑफ प्रिंस रामा' का एक सीन।

एनिमेटेड फिल्म ‘रामायण द लीजेंड ऑफ प्रिंस रामा’ का एक सीन।

रामायण पर बनी जापानी फिल्म भारत में बैन

हिंदू काव्य रामायण पर केवल भारत में ही नहीं, बल्कि जापान में भी फिल्म बन चुकी है। इस जापानी फिल्म का नाम ‘रामायण द लीजेंड ऑफ प्रिंस रामा’ था जो कि एनिमेटेड फिल्म थी। दरअसल, 1983 में जापानी फिल्ममेकर यूगो साको जब पहली बार भारत आए तो उन्हें रामायण के बारे में मालूम चला। उन्होंने जापानी में रामायण के 10 वर्जन पढ़े और फिल्म बनाने के बारे में सोचा।

1990 के दशक में फिल्म की मेकिंग शुरू हुई, लेकिन इससे पहले ही ये विवादों में आ गई। विश्व हिंदू परिषद ने रामायण को एनिमेशन में बनाने का विरोध किया। उनका कहना था कि रामायण को कार्टून की तरह दिखाना सही नहीं होगा। इस संबंध में जापानी ऐंबैसी को भी पत्र लिखा गया जिसके बाद यूगो साको ने ये भरोसा दिलाया कि वो किसी की भावनाओं को आहत नहीं होने देंगे।

यूगो के भरोसे के बाद फिल्म के बनने का रास्ता साफ हुआ। 450 आर्टिस्ट्स ने फिल्म की मेकिंग में हिस्सा लिया। सीरियल रामायण में राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल ने इस फिल्म की हिंदी डबिंग में राम के कैरेक्टर के लिए आवाज दी थी। 1992 में जब फिल्म रिलीज होने का मौका आया तो बाबरी मस्जिद विवाद के चलते इसे इंडिया में रिलीज नहीं किया गया। बाद में इसे कार्टून नेटवर्क पर दिखाया जाने लगा था।

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