Javed Akhtar Birthday Interesting Facts; Famous Dialogues And Songs | पिता ने कहा- मियां अपने लिए ठिकाना देख लो: स्टूडियो की बेंच पर जावेद अख्तर ने गुजारे कई दिन, फिर सबसे महंगी राइटर जोड़ी बनी

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12 घंटे पहलेलेखक: ईफत कुरैशी

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मेरे पास मां है…..आज खुश तो बहुत होगे तुम…..जब तक बैठने को न कहा जाए खड़े रहो…..

बेहतरीन सदाबहार डायलॉग लिखे गए हैं जावेद अख्तर की कलम से। अपनी लिखावट से भारतीय सिनेमा की आवाज बने जावेद अख्तर आज 79 साल के हो चुके हैं।

आज भी मुस्लिम परिवार में जन्में हर बच्चे के कानों में सबसे पहले अजान पढ़ी जाती है, लेकिन नामचीन लेखकों के घराने में जन्में जावेद अख्तर के कानों में पिता जान निसार अख्तर ने जर्मन फिलॉस्फर का स्लोगन पढ़ा। शब्द थे- “Workers of the world unite; you have nothing to lose but your chains”

तर्जुमा हुआ, “दुनियाभर के कामगार एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं बस तुम्हारी जंजीरें हैं। “

इससे भी मजेदार बात ये कि जावेद अख्तर के राइटर पिता ने उनका नाम भी एक नज्म “लम्हा-लम्हा जादू का फसाना होगा” पर जादू ही रखा था। पैदाइश से जावेद का नज्म, फनकारी और हाजिरजवाबी से ऐसा अटूट रिश्ता बना, जो आज 79 सालों बाद भी लोगों का दिल जीतता रहा है। जावेद की जिंदगी में जो कुछ भी हासिल है उसका कारण उनकी नज्में हैं, चाहे तरक्की हो, सलीम खान से दोस्ती हो या शबाना आजमी का जिंदगी भर का साथ।

आज 79वें जन्मदिन पर पढ़िए जावेद साहब की जादूनामा सी जिंदगी के अनसुने किस्से-

ऐ दिल ऐ नादान…….. (रजिया सुल्तान- 1983), आंखों ही आंखों में इशारा हो गया………(सीआईडी- 1956), 50 के दशक के ये मशहूर गाने लिखे गए थे जान निसार अख्तर की कलम से। वही जान निसार अख्तर, जिनका नाम आज भी मशहूर उर्दू और हिंदी राइटर्स में सबसे ऊपर की पंक्तियों में लिखा जाता है। 1943 में जान निसार अख्तर ने जाने-माने कवि मजाज़ की बहन साफिया से शादी की। इस शादी से उन्हें 1945 में एक नायाब तोहफा मिला, वो तोहफा थे जावेद अख्तर।

17 जनवरी 1945 ।

ग्वालियर के कमला अस्पताल में जावेद साहब का जन्म हुआ। वैसे तो पैदा हुए मुस्लिम बच्चे के कान में अजान पढ़ने की रिवायत है, लेकिन राइटर जान निसार अख्तर ठेहरे नास्तिक। तो अब अस्पताल पहुंचे दोस्तों में यही कानाफूसी हुई और फिर एक दोस्त ने आखिर कह दिया- तुम तो अल्लाह पर यकीन नहीं करते। तुम तो नास्तिक हो, तुम क्या करोगे।

वही दोस्त हाथ में जर्मन के मशहूर फिलॉस्फर मार्क्स कार्ल की कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो बुक थामा हुआ था। जान निसार ने वो किताब देखी और कहा- जरा देना, इसके कान में यही पढ़ देते हैं। ऐसे जावेद के कानों में अजान की जगह कहा गया, Workers of the world unite; you have nothing to lose but your chains….(दुनियाभर के कामगार एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं बस तुम्हारी जंजीरें हैं), अब जिस बच्चे के कानों में पहली आवाज कम्युनिस्ट स्लोगन की गूंजी हो, वो भला बड़ा होकर राइटर क्यों न बनता।

खैर, कहानी में दोबारा लौटते हैं, बच्चे को लेकर जान निसार घर पहुंचे, तो उसे देखने के लिए दोस्तों और रिश्तेदारों का जमावड़ा लग गया। भीड़ में खड़े एक दोस्त ने यूं ही पूछ लिया, इस बच्चे का नाम क्या रखोगे?

दिमाग पर जोर दिया तो शादी के समय पत्नी साफिया के लिए लिखी गई नज्म गूंज उठी। वो नज्म थी- “लम्हा- लम्हा किसी जादू का फसाना होगा।”

जान निसार तुरंत बोल पड़े- क्यों न इस बच्चे का नाम जादू रखा जाए?

उनकी कही बात कौन टालता, तो बस नाम पड़ गया जादू। 4 सालों तक जावेद अख्तर अपने परिवार वालों के लिए जादू ही रहे, लेकिन अब बारी आई स्कूल में दाखिला करवाने की। परिवार वालों ने अब गौर किया कि जादू तो कोई संजीदा नाम नहीं है। भला इस नाम के साथ दाखिला कैसे करवाया जाए। दूसरे बच्चे भी नाम का मजाक बनाएंगे। पिता जान निसार को जादू नाम से इस कदर लगाव था कि उन्होंने नाम तो बदला, लेकिन ऐसा नाम जो जादू से मिलता-जुलता हो। तो ऐसे जादू का नाम पड़ गया जावेद।

13 साल की उम्र में ली गई जावेद अख्तर की तस्वीर।

13 साल की उम्र में ली गई जावेद अख्तर की तस्वीर।

जान निसार अख्तर जब अपनी किस्मत आजमाने बॉम्बे (अब मुंबई) गए, तो साफिया ने ग्वालियर में रहकर दोनों बच्चों की परवरिश की। उस दौर में टेलीफोन या मोबाइल नहीं होता था, तो साफिया अपने बच्चों की बदमाशियां और शरारतें खतों के जरिए पति तक पहुंचाया करती थीं।

जावेद अख्तर बचपन से ही बातें बनाने में माहिर थे। एक दफा मुंबई भेजे गए एक खत में साफिया ने बेटे जावेद का जिक्र कर लिखा था, जादू के हालात सुनाने के नहीं हैं, उसे बस देख सकते हैं। वो बातें तो बेतहाशा बनाता है। जब उससे पूछा जाए कि तुम्हारे दादा जी कौन हैं, तो जवाब मिलता है, स्टालिन और चच्चा का नाम पूछने पर कहते हैं दालिब यानी गालिब।

मां साफिया अख्तर के साथ ली गई जावेद अख्तर (दाहिने) की तस्वीर।

मां साफिया अख्तर के साथ ली गई जावेद अख्तर (दाहिने) की तस्वीर।

(नोट- साफिया के पति जान निसार अख्तर को लिखे गए 1 अक्टूबर 1943- 29 दिसंबर 1953 के दरमियानी खतों को 1955 में ‘हर्फ-ए-आशना’ और ‘जेर-ए-लब’ नाम से पब्लिश किया गया था। इन खतों को जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रोफेसर असगर वजाहत ने 2004 में ट्रांसलेट कर ‘तुम्हारे नाम’ टाइटल के साथ दोबारा पब्लिश किया था)

जावेद महज 9 साल के थे, जब उनकी मां की किसी लाइलाज बीमारी से मौत हो गई। जान निसार पत्नी के गम में बुरी तरह टूट गए, लेकिन ये दुख 9 साल के बेटे के लिए ज्यादा बड़ा था। मां गुजरी तो पिता भी गम से उबरने के लिए रिश्तेदारों के भरोसे छोड़कर लेखन में मशगूल हो गए। रिश्तेदारों के आसरे में आधी पढ़ाई लखनऊ से हुई, कुछ साल अलीगढ़ में गुजरे और कुछ भोपाल के सैफिया कॉलेज में। भोपाल में पढ़ाई के दिनों में जावेद साहब के कोई रिश्तेदार शहर में नहीं थे, तो वो कॉलेज के ही एक कमरे में गुजारा कर लिया करते थे। सालों से बंद कमरे में जब जावेद रहने पहुंचे, तो वहां खटमलों की भरमार थी, लेकिन मजबूरी क्या नहीं करवाती।

जावेद अख्तर की बुक जादूनामा लिखने वाले राइटर अरविंद मंडलोई ने लिखा था कि जावेद साहब की जिंदगी में बहुत तकलीफें थीं, इतनी तकलीफें, जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी लेख में जावेद साहब की खाने की स्पीड की भी वाहवाही हुई। वो महज 3 मिनट में खाना खा लिया करते थे, लेकिन ये कोई रिकॉर्ड नहीं मजबूरी थी। दरअसल, जावेद कॉलेज के ही कमरे में रहते थे और एक होटल में उधार लेकर खाना खाते थे। रोज-रोज उधार में खाने से होटल का मालिक चिकचिक करता था। तो उसके आने के वक्त से पहले ही जावेद जल्दबाजी में खाना खत्म कर निकल जाया करते थे।

जैसे-तैसे जावेद साहब ने पढ़ाई के नाम पर भोपाल में जद्दोजहद करते हुए दिन गुजारे और फिर एक दिन बोरिया बिस्तर बांधकर मुंबई जाकर किस्मत आजमाने का हौसला कर लिया। वैसे सपना तो उनका डायरेक्टर बनने का था, लेकिन किस्मत में लिखा कौन टाल सकता है। वो तारीख 4 अक्टूबर 1964 थी, जब वो बॉम्बे सेंट्रल स्टेशन पर उतरे और अपने पिता के पते पर पहुंच गए। पिता ने अपने पास ठहराया जरूर, लेकिन महज 6 दिनों में ही उन्होंने कह दिया कि मियां अपना खुद का ठिकाना ढूंढ लो।

पिता की बेरुखी के बाद जेब में 27 पैसे लिए जावेद साहब काम ढूंढने के लिए कमाल स्टूडियो के चक्कर काटने लगे। काम तो मिला नहीं, लेकिन स्टूडियो के बाहर लगे बरगद के पेड़ के नीचे बनी बेंच में उन्हें सोने का ठिकाना मिल गया। कुछ दिनों बाद जावेद के लिए कमाल अमरोही का कमाल स्टूडियो ही घर बन गया। जिस समय स्टूडियो में शूटिंग नहीं होती तो जावेद साहब अंदर जाकर घूमा करते थे। ये वो दौर था जब कमाल अमरोही और मीना कुमारी अलग हो चुके थे, जिससे फिल्म पाकीजा की शूटिंग बंद पड़ गई थी।

एक दिन मौका पाते ही जावेद साहब मीना कुमारी के मेकअप रूम में घुस गए। फिल्म पाकीजा के लिए बनाए गए पुराने जमाने के सामान के बीच उन्हें एक पेटी दिखी। पेटी खोली तो देखा उसमें मीना कुमारी के 2-4 अवॉर्ड धूल खाते पड़े थे। जावेद साहब ने पहले ट्रॉफी हाथ में ली और फिर पास पड़े धूल खा रहे शीशे से धूल हटाई। स्टाइल से ट्रॉफी हाथ में ली और जहन में सोचा कि जब मुझे ये ट्रॉफी मिलेगी, तो तालियों की गूंज के बीच मैं मुस्कुराते हुए भीड़ का इस्तकबाल करूंगा। किसे पता था एक दिन उन्हीं जावेद साहब के घर में ट्रॉफी और अवॉर्ड का पूरा कलेक्शन होगा।

खैर, कहानी मैं लौटते हैं। बीतते समय के साथ जेब में पड़े 27 पैसे खत्म होने को थे। इसी बीच भोपाल के कॉलेज में बने दोस्त मोहम्मद अली ताज ने सिफारिश कर उनकी डायरेक्टर एस.एम. सागर के पास असिस्टेंट की नौकरी लगवा दी। तनख्वाह थी 100 रुपए प्रति महीना।

उस समय एस.एम सागर फिल्म सरहदी लुटेरा की स्क्रिप्ट पर फिल्म बनाने की सोच रहे थे, लेकिन कहानी ऐसी थी कि कोई राइटर उसके डायलॉग लिखने की जिम्मेदारी नहीं ले रहा था। एस.एम. सागर को परेशान देख एक दिन जावेद साहब ने कहा- क्या मैं इस फिल्म के डायलॉग लिख दूं।

जवाब मिला- कोशिश करके देख लो।

जावेद साहब ने कलम उठाई और चंद घंटों में ऐसे डायलॉग लिखे, जिन्हें पढ़कर एस.एम. सागर भी खुश हो गए। इस फिल्म के हीरो थे सलीम खान (सलमान खान के पिता)। जावेद साहब ने भले ही फिल्म के डायलॉग में जान फूंक दी, लेकिन सेट पर वो क्लैपबॉय ही रहे। साथ काम करते हुए जावेद साहब की सलीम खान से दोस्ती गहरी होती चली गई। जब कुछ दिनों बाद जावेद साहब मशहूर राइटर कैफी आजमी (शबाना आजमी के पिता) के असिस्टेंट बने तो उनके पड़ोसी अबरार अल्वी के साथ सलीम खान काम करते थे। दोस्ती और मुलाकातें बढ़ीं, तो उनकी ज्यादातर चर्चा डायलॉग्स और लेखन पर ही होती थीं।

सलीम खान के साथ जावेद अख्तर की तस्वीर।

सलीम खान के साथ जावेद अख्तर की तस्वीर।

एक दिन दोनों बातों में मशगूल थे कि उनके घर पर एस.एम. सागर पहुंच गए।

एस.एम. सागर साहब ने कहा- मैंने माधुरी मैग्जीन से एक कहानी तो खरीद ली है, लेकिन उसका स्क्रीनप्ले नहीं बन पा रहा। तुम अगर स्क्रीनप्ले लिख दो, तो मैं तुम्हें ही पैसे दे दूंगा।

जावेद साहब झट से बोल पड़े- कितने पैसे देंगे?

जबाव मिला- 5000 रुपए।

100 रुपए की तनख्वाह में काम करने वाले किसी नौजवान के लिए इकट्ठे 5 हजार मिलना किसी लॉटरी से कम नहीं था। इतनी बड़ी रकम तो जावेद साहब ने कभी एक साथ देखी भी न थी। सलीम-जावेद ने मिलकर पहली बार फिल्म अधिकार लिखी, जो जबरदस्त हिट रही। फिल्म की स्क्रीनिंग में ही एक शख्स ने उन्हें सलाह दी कि आप लोग सिप्पी फिल्म क्यों नहीं चले जाते।

जावेद साहब समय निकालकर रमेश सिप्पी के प्रोडक्शन हाउस पहुंच गए। बातचीत में वो लगातार कहते रहे, हम लोग ऐसा लिखते हैं, हम ऐसे काम करते हैं।

सिप्पी साहब ने पूछ लिया- ‘हम’ से क्या मतलब है आपका।

जवाब दिया- मैं और सलीम खान। हम दो आदमी हैं और हम साथ काम करते हैं।

आगे से कहा गया- आप दोनों फिर साथ ही आइए।

दो दिन बाद जावेद अख्तर, सलीम खान को लेकर स्टूडियो के लिए निकल पड़े। रास्ते में जावेद साहब ने सलीम खान से पूछा, अगर उन्होंने हमें नौकरी दे दी, तो हम पैसा कितना मांगेंगे?

सलीम खान ने कहा- 1-1 हजार रुपए।

1 हजार रुपए तनख्वाह इतनी ज्यादा थी कि जावेद साहब घबरा कर बोल उठे- अरे, ये क्या बोल रहे हो। इतनी तनख्वाह कौन देगा?

लेकिन सलीम साहब की जुर्रत और कॉन्फिडेंस देखकर जावेद साहब ने ये बात मान ली।

दफ्तर पहुंचकर जब दोनों ने कुछ कहानियां सुनाईं, तो रमेश सिप्पी ने पूछा- कितने पैसे लोगे?

जावेद साहब अंदर से तो घबराए हुए थे, लेकिन ऊपरी दिखावट करते हुए उन्होंने बेहद कॉन्फिडेंस से कहा- हजार-हजार रुपए।

अंदाज यूं था कि जैसे मानों सालों से उन्हें यही तनख्वाह मिलती आई हो।

खैर, हजार रुपए की डिमांड उस दौर में काफी ज्यादा थी, लेकिन सलीम-जावेद की जोड़ी के पास वो हुनर था कि सिप्पी साहब ने उन्हें कहा- शुरुआत में हम आपको 750-750 रुपए देंगे।

इतनी बड़ी तनख्वाह पाना कोई आम बात तो थी नहीं, तो नौकरी पक्की होते ही जावेद अख्तर ने सोच लिया कि अब तो जिंदगी आराम से कटेगी।

सलीम-जावेद की जोड़ी लिखती गई और तरक्की होती गई, लेकिन अब भी दोनों को इंडस्ट्री में पहचान मिलनी बाकी थी, पहचान दिलाने का काम किया राजेश खन्ना और उनकी एक घर खरीदने की जिद ने। 70 के दशक की बात है, राजेश खन्ना को एक दिन कार्टर रोड स्थित आशीर्वाद बंगला पसंद आ गया। बंगले की कीमत साढ़े चार लाख रुपए थी, लेकिन उनके पास इतने पैसे नहीं थे। ढाई लाख रुपए कम पड़ रहे थे, जिसके लिए उन्होंने फिल्म अंदाज साइन कर ली। फिल्म के लिए उन्होंने ढाई लाख रुपए का साइनिंग अमाउंट लिया और तुरंत घर खरीद लिया। जब रकम उड़ाने के बाद राजेश खन्ना ने फिल्म अंदाज की स्क्रिप्ट देखी, तो वो समझ गए कि अगर उसी स्क्रिप्ट के साथ ये फिल्म कर ली तो करियर बर्बाद हो जाएगा। उस समय फिल्मी गलियारों में जावेद-सलीम की जोड़ी की खूब वाहवाही हुआ करती थी, तो मदद मांगने के लिए राजेश खन्ना भी उन्हीं के पास पहुंच गए।

सलीम-जावेद से मिलकर राजेश खन्ना ने कहा- देखो, मैंने फिल्म अंदाज के लिए 2.5 लाख का साइनिंग अमाउंट ले लिया है, और मैं कार्टर रोड पर घर खरीद रहा हूं। घर की कीमत 4.5 लाख है, और मुझे ये किसी भी कीमत पर खरीदना है। मैं प्रोड्यूसर के पैसे लौटा भी नहीं सकता। दूसरी तरफ अगर मैं इसी कहानी पर फिल्म कर दूं तो इंडस्ट्री से बाहर चला जाऊंगा। मेरे सामने बहुत बड़ी मजबूरी आ गई है, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम दोनों कैसे भी करके इसे ठीक कर दो।

राजेश खन्ना ने वादा किया कि अगर स्क्रिप्ट अच्छी रही तो दोनों को मोटी रकम और फिल्म में बतौर राइटर क्रेडिट दिलवाएंगे। क्योंकि उस समय तक राइटर्स को सिर्फ मेहनताना दिया जाता था, क्रेडिट नहीं। बात बन गई और दोनों फिल्म की स्क्रिप्ट सुधारने में लग गए। प्रोड्यूसर को दोनों का काम इतना पसंद आया कि फिर पुरानी कहानी की जगह उनकी सुधारी हुई स्क्रिप्ट पर फिल्म बनी। राजेश खन्ना ने उन दोनों को 5-5 हजार रुपए दिलवाए, जो उस जमाने में बड़ी रकम थी। फिल्म अंदाज सुपरहिट रही और इससे हेमा मालिनी स्टार बनीं। इसके बाद से ही सलीम-जावेद की राइटर जोड़ी की चर्चा पूरी फिल्म इंडस्ट्री में हुई। राजेश खन्ना ने अगली सुपरहिट फिल्म हाथी मेरे साथी का स्क्रीनप्ले भी उन्हीं से लिखवाया।

जब तक बैठने को न कहा जाए खड़े रहो, ये पुलिस स्टेशन है तुम्हारे बाप का घर नहीं…

1973 की फिल्म जंजीर का ये डायलॉग यूं तो अमिताभ बच्चन की भारी आवाज और अंदाज से यादगार बना, लेकिन इसे लिखा था, जावेद अख्तर ने। फ्लॉप हीरो कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन को भी सलीम-जावेद की सिफारिश से फिल्म मिली थी।

सलीम-जावेद का जिक्र हो तो जंजीर, अमिताभ बच्चन और पोस्टर में नाम लिखवाने के किस्से का होना भी लाजमी है। लंबे कद वाले अमिताभ ने बैक-टु-बैक कई फ्लॉप फिल्मों में काम किया, तो प्रोड्यूसर्स उन्हें फिल्मों में लेने से झिझकने लगे। उस समय सलीम-जावेद ने प्रकाश मेहरा की फिल्म जंजीर लिखी थी। जब उस फिल्म में कोई नामी हीरो काम करने को राजी नहीं हुआ तो सलीम-जावेद ने प्रकाश मेहरा को अमिताभ बच्चन के नाम का सुझाव दिया। प्रकाश मेहरा ने दोनों की बात मान ली और अमिताभ को फिल्म में लेने का रिस्क ले लिया।

जब फिल्म बनकर पूरी हुई तो प्रकाश मेहरा फिल्म के पोस्टर पर काम करवा रहे थे। उस पोस्टर में हीरो का नाम था, हीरोइन का नाम, डायरेक्टर- प्रोड्यूसर का नाम था, लेकिन राइटर का कहीं नामोनिशान नहीं था। यही रीत थी, लेकिन दोनों ये बदलना चाहते थे, उनका मानना था कि फिल्म तभी चलती है, जब कहानी अच्छी हो।

एक दिन हिम्मत कर दोनों ने प्रकाश मेहरा से कहा, हमारे नाम भी पोस्टर में होने चाहिए।

इस पर प्रकाश मेहरा ने टालते हुए कहा, राइटर्स के नाम? ऐसा होता है कभी?

प्रकाश मेहरा का जवाब सुनकर दोनों ने कुछ नहीं कहा। अब पूरे शहर में पोस्टर लग चुके थे, लेकिन ये बात सलीम-जावेद को खल रही थी। एक दिन जावेद साहब के साथ बैठकर सलीम साहब ने जमकर शराब पी और एक तरकीब निकाली। उन्होंने जी.पी. सिप्पी के प्रोडक्शन हाउस में काम करने वाले सुरेश नाम के एक लड़के को कॉल किया। दो जीप और कुछ पेंटिंग का सामान लाने को कहा। जैसे ही लड़का पहुंचा तो सलीम साहब ने उससे कहा कि पूरे शहर में लगे पोस्टर में लिख दो- रिटन बाय सलीम-जावेद। वैसा ही हुआ। अगले दिन शहर में लगे जंजीर के पोस्टर कुछ बदल चुके थे।

अमिताभ बच्चन की नाक, जया बच्चन के चेहरे और प्राण नाथ के माथे के ऊपर सलीम-जावेद का नाम लिखा हुआ था। खूब हलचल मची और इस बागीपन के चर्चे भी हुए, लेकिन दोनों ने इतिहास रच दिया। हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहली बार किसी स्क्रीनराइटर का नाम पोस्टर पर लिखा गया था।

अब सलीम-जावेद की जोड़ी के पास नाम था, पहचान थी और शोहरत भी थी, लेकिन एक और इतिहास रचना बाकी था। वो इतिहास था, हीरो से ज्यादा और मुंहमांगी फीस। सुपरहिट फिल्में लिखते हुए सलीम-जावेद की फिल्म 5 हजार से 1 लाख पहुंच चुकी थी। लेकिन फिर दोनों ने तय किया कि जो भी फिल्म करेंगे उसके ढाई लाख लेंगे।

जब फिल्म जंजीर लगी तो उसका ट्रायल शो देखने के बाद यश चोपड़ा ने अपने असिस्टेंट रमेश तलवार से कहा कि दोनों लड़कों को मिलने बुला लेना। जावेद-सलीम उनसे मिलने दफ्तर पहुंचे तो उन्होंने पूछा, कोई स्क्रिप्ट हो तो बताओ।

जावेद साहब ने कहा- स्क्रिप्ट तो है, लेकिन लोग पैसे नहीं देते।

यश जी ने कहा- पैसों की चिंता मत करो, स्क्रिप्ट बताओ, पसंद आ गई, तो तुम्हें पैसे मिल जाएंगे।

अगले दिन जावेद साहब उनके पास स्क्रिप्ट लेकर पहुंचे और कहा, मैं आपसे फिल्म का एडवांस नहीं मांग रहा, लेकिन आप स्क्रिप्ट पढ़ें उससे पहले मैं आपको फीस इसलिए बता रहा हूं, जिससे आपको ये न लगे कि मैं पसंद आने पर ब्लैकमेल कर रहा हूं।

यश चोपड़ा मान गए और फीस पूछ ली। जावेद अख्तर ने कहा- 2 लाख।

ये सुनकर यश चोपड़ा कुछ सेकेंड्स के लिए खामोश हो गए, फिर जावेद को ऊपर-नीचे देखते हुए अपने असिस्टेंट को बुलाया।

जावेद साहब को लगा कि असिस्टेंट को बुला रहे हैं, मतलब बात बन गई। जैसे ही असिस्टेंट पहुंचा, तो यश चोपड़ा ने उनसे कहा- ऐ, जो मुझे बोल रहा था, वो इसको भी बोल।

ये कहते ही वो जोर से हंस पड़े। जावेद अख्तर की डिमांड का मजाक बन गया। फिल्मी गलियारों में दोनों का खूब मजाक बना, लेकिन दोनों ने जिद नहीं छोड़ी।

करीब 8 महीनों तक दोनों के पास कोई फिल्म नहीं रही, लेकिन जब जंजीर सुपरहिट हुई, तो सलीम-जावेद की जोड़ी हर फिल्ममेकर की पहली पसंद बन गई।

कुछ दिनों बाद यश चोपड़ा ने फिर अपने असिस्टेंट से कहा, जाओ, सलीम-जावेद से कहो कि हम उन्हें 2 लाख फीस देने को तैयार हैं। उन्हें जल्दी से साइन कर लो।

जब रमेश तलवार, सलीम-जावेद के पास पहुंचे तो उन्हें जवाब मिला, 2 लाख फीस तो जंजीर रिलीज होने से पहले की थी, अब हम 5-5 लाख रुपए लेंगे।

हुनर ऐसा हल्ला कर रहा था कि यश चोपड़ा को उनकी मांग पर राजी होना पड़ा। सलीम-जावेद की जोड़ी को फिल्म दोस्ताना के लिए 12 लाख 50 हजार रुपए दिए गए। जबकि फिल्म के हीरो और सुपरस्टार अमिताभ को उस फिल्म के 12 लाख रुपए मिले थे। स्टार से भी 50 हजार ज्यादा फीस लेकर सलीम-जावेद ने हिंदी सिनेमा में इतिहास रच दिया।

जितना उनका 2 लाख फीस मांगने पर मजाक उड़ाया गया था, उतनी ही ज्यादा तारीफें उनके खाते में आईं। सलीम-जावेद की जोड़ी को ही हिंदी सिनेमा में स्क्रीनराइटर्स की किस्मत बदलने का श्रेय दिया जाता है, उन्हें हिंदी सिनेमा की पहली स्टार राइटर जोड़ी कहा जाता है। यादों की बारात, जंजीर, दीवार, दोस्ताना, शोले से सलीम-जावेद ने मसाला फिल्मों का वो दौर लाया, जो आज भी एक मिसाल है।

अगर कभी पूछा जाए कि हिंदी सिनेमा के इतिहास की सबसे आला दर्जे की फिल्म कौन सी है, तो जाहिर है कि उन फिल्मों की फेहरिस्त में शोले का नाम भी जरूर शामिल किया जाएगा। मगर क्या फिल्म शोले को बिना उसके डायलॉग के कभी याद किया गया है। बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना…..अरे ओ सांभा कितने आदमी थे….हमारा नाम सूरमा भोपाली यूं ही नहीं है…..हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं….तुम्हारा नाम क्या है बसंती…..फिल्म का हर किरदार अपने एक डायलॉग से यादगार हो गया।

लेकिन ये फिल्म इस मुकाम पर नहीं होती, अगर सलीम-जावेद अपनी जिद पर न अड़े होते। दरअसल, जब रमेश सिप्पी ने फिल्म लिखवाई तो वो समझ नहीं पाए कि स्क्रिप्ट पर बनी फिल्म चलेगी या नहीं। लेकिन दूरदर्शिता के लिए जाने गए सलीम-जावेद ने उन्हें फिल्म हिट होने की गारंटी दे दी। अब इसे उनकी अकड़ कहा जाए या आत्मविश्वास या कॉमन सेंस।

फिल्म लगी तो देखने वालों ने पहले ही दिन कह दिया कि ये फिल्म तो पिट जाएगी। पहले ही हफ्ते में कई ट्रेड मीटिंग बुलाई गईं, जिसमें लोग ये चर्चा कर रहे थे कि शोले फ्लॉप क्यों हुई।

डरे हुए रमेश सिप्पी ने सीधे जावेद अख्तर के घर पर मीटिंग बुला ली। उन्होंने अमिताभ बच्चन, जी.पी. सिप्पी की मौजूदगी में सलीम-जावेद से कहा- सुनो, फिल्म को री-शूट करना पड़ेगा। क्लाइमैक्स से अमिताभ के मरने वाला सीन हटा दो और दूसरे कुछ और सीन को बदल दो।

रमेश सिप्पी का मानना था कि अगर कुछ सीन बदल दिए जाएं, तो शायद नुकसान से बचा जा सकता है।

जावेद साहब सहमत नहीं हुए, उन्होंने पूछा- ये जो आपकी फिल्म आई थी, मेरा गांव मेरा देश, उसने कितनी कमाई की थी।

जवाब मिला- यही कुछ 50 लाख रुपए।

जावेद साहब ये सुनकर बोले- जब उस फिल्म ने 50 लाख कमाए तो ये 1 करोड़ कमाई क्यों नहीं करेगी।

रमेश सिप्पी बौखला गए और कहा- अरे आप पागल हो गए हैं? ये फिल्म फेल नहीं हो सकती? ये फिल्म फेल हो चुकी है। चेन टूट गई है, लोग थिएटर में नहीं हैं। बात क्या कर रहे हो।

सलीम-जावेद ने किसी की न सुनी और वो साहसी कदम उठाया, जो आज तक किसी ने नहीं किया। उन्होंने एक घोषणापत्र बनाया, जिसमें लिखा था- हम सलीम-जावेद ये गारंटी लेते हैं कि फिल्म 1 करोड़ कमाएगी।

ये फुल पेज घोषणापत्र उन्होंने थिएटर की स्क्रीन में और ट्रेड गाइड में चलवाया। उससे पहले तक किसी भी हिंदी फिल्म ने 1 करोड़ नहीं कमाए थे, लेकिन सलीम-जावेद के भरोसे और हुनर ने ये काम भी कर दिखाया। इस जोड़ी की लिखीं 24 में से 20 फिल्में सुपरहिट रहीं। फिर 1982 में फिल्म मिस्टर इंडिया के बाद दोनों की कुछ मतभेदों के चलते जोड़ी टूट गई।

पिता जान निसार अख्तर (सेंटर) के साथ जावेद अख्तर (लेफ्ट) और छोटे भाई।

पिता जान निसार अख्तर (सेंटर) के साथ जावेद अख्तर (लेफ्ट) और छोटे भाई।

जावेद अख्तर ने मशहूर लेखक होने के बावजूद भी 1979 में भरे मंच पर पहली बार अपनी आवाज में शायरी कही थी। ये वही साल था, जब उनके पिता जान निसार अख्तर फौत हुए थे। जावेद की कभी पिता जान निसार अख्तर ने नहीं बनी, न ही दोनों ने कभी रिश्ते सुधारने की कोशिश की, हां लेकिन उनका मिलना-जुलना जरूर था।

जान निसार अख्तर ने 10 अगस्त 1979 को जावेद साहब को मिलने बुलाया था। जावेद के आते ही कंपकंपाते हाथों से जान निसार अख्तर ने अपनी आखिरी किताब में ऑटोग्राफ दिया और जावेद को थमा दी। ऑटोग्राफ के साथ लिखा था, “जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे।”

इस मुलाकात के महज 9 दिनों बाद 19 अगस्त 1976 को ही जान निसार अख्तर का निधन हो गया। पिता की मौत के बाद जावेद अख्तर ने भरी महफिल में एक शायरी पढ़ी। 7 पीढ़ियों से शेर-ओ- शायरी करने वाले परिवार से ताल्लुक रखने वाले जावेद साहब का ये एक तरीका था, पिता से मिली नज्मों की विरासत का मंच पर दिखावा कर उनसे बिना कुछ कहे सुलह करने का।

जावेद अख्तर के करीबी लोग कहते हैं कि अगर किसी शख्स ने कभी बुरे वक्त में उनका साथ दिया हो, तो वो कभी भूलते नहीं हैं। शुरुआती सफर में जावेद अख्तर, कैफी आजमी के असिस्टेंट थे। कामयाब होने के बावजूद जावेद साहब का उनके घर आना-जाना लगा रहता था। दोनों के बीच शेर-ओ-शायरी की महफिल सजती थी, जिसे देखने के लिए कैफी साहब की बेटियां शबाना और शौकत अक्सर फुर्सत लेकर बैठती थीं।

इसी तरह की चंद मुलाकातों के बाद ही जावेद और शबाना ने जिंदगी भर साथ रहने का फैसला कर लिया। जबकि जावेद साहब 1972 में हनी ईरानी से शादी कर चुके थे, जिनसे उन्हें दो बच्चे फरहान अख्तर और जोया अख्तर थे। वहीं शबाना के पेरेंट्स भी उनकी एक शादीशुदा व्यक्ति से शादी करवाने के लिए राजी नहीं थे। लेकिन दोनों की जिद के आगे किसी की नहीं चली। आखिरकार 1984 में शबाना आजमी और जावेद अख्तर ने शादी कर ली। जावेद साहब की पत्नी ने उनके इस फैसले की इज्जत रखी, लेकिन एक साल बाद 1985 में दोनों ने तलाक ले लिया। तलाक के सालों बाद भी दोनों में रिश्ते बेहतर हैं।

जावेद अख्तर के हुनर का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब यश चोपड़ा के असिस्टेंट रमन कुमार ने फिल्म साथ-साथ बनाई तो जावेद साहब ने उनकी विनती पर बिना फीस लिए ही गाना लिख दिया। वो गाना था- तुमको देखा तो ये ख्याल आया….. सुनने वालों के लिए यकीन करना मुश्किल होगा लेकिन वाकई ट्रेन छूटने के डर से जावेद साहब ने ये गाना महज 9 मिनट में लिख दिया था। इसी तरह स्वेदश के गाने पल-पल है भारी.. को भी जावेद साहब ने महज 1 से ढेड़ घंटे में लिखा। फिल्मी डायलॉग्स के अलावा जावेद साहब की कलम से लिखे गए गाने, तुमको देखा तो ये ख्याल आया, नीला आसमां सो गया, देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए, ये कहां आ गए हम आज भी सदाबहार हैं।

सिलसिला, लावारिस, मिस्टर इंडिया, सागर, 1942ः लव स्टोरी, रिफ्यूजी, बॉर्डर, विरासत, डुप्लीकेट, बादशाह, लगान, कल हो न हो, डॉन, ओम शांति ओम, जोधा अकबर, रॉक ऑन, माय नेम इज खान, तलाश, रईस और डंकी जैसी कई फिल्मों के गाने जावेद अख्तर ने ही लिखे हैं।

हिंदी सिनेमा में दिए योगदान के लिए जावेद अख्तर को 6 नेशनल अवॉर्ड, पद्मश्री, पद्मभूषण, साहित्य एकेडमी अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है। रिचर्ड डॉकिन्स हासिल करने वाले जावेद अख्तर भारत के इकलौते शख्स हैं।

अवॉर्ड कलेक्शन के साथ ली गई जावेद अख्तर की तस्वीर।

अवॉर्ड कलेक्शन के साथ ली गई जावेद अख्तर की तस्वीर।

Ref.-

https://www.youtube.com/watch?v=qN1hDfuZmBw&t=913s

https://www.bbc.com/hindi/entertainment-64263147

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