Durga Khote Tragic Story; Freelance Actress | Mughal-e-Azam | क्रू मेंबर को बचाने के लिए चीते से भिड़ीं: कम उम्र की विधवा दुर्गा खोटे बेटों की खातिर फिल्मों में आईं, कभी सबसे रईस हीरोइन थीं

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19 मिनट पहलेलेखक: ईफत कुरैशी

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1960 की एपिक ड्रामा हिस्टोरिकल फिल्म मुगल-ए-आजम भला किसने नहीं देखी। इस फिल्म में सलीम की मां जोधा बाई का बेहतरीन रोल निभाया था दुर्गा खोटे ने। पहले ये तस्वीर देखिए-

दुर्गा खोटे हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर की सबसे रईस, पढ़ी-लिखी और इज्जतदार खानदान से ताल्लुक रखने वाली हीरोइन थीं। एक दौर में सिनेमा को महिलाओं के लिए असभ्य पेशा माना जाता था, ऐसे में पुरुष ही महिलाओं के किरदार भी निभाते थे, उस दौर में पति की मौत के बाद अपने दो बच्चों की परवरिश की लिए दुर्गा मजबूरन फिल्मों में आईं। 26 साल की विधवा दुर्गा जब फिल्मों में आईं तो समाज ने उनका जमकर विरोध किया, लेकिन दुर्गा ने अपने हुनर से खुदको सिनेमा में स्थापित करने के साथ-साथ महिलाओं के लिए सिनेमा के रास्ते खोले। वहीं पहली बोलती मराठी फिल्म, पहली दो भाषाओं में बनी फिल्म और पहली फ्रीलांस एक्ट्रेस बनकर दुर्गा ने कई बार इतिहास रचा। कहा जाता है कि दुर्गा इतनी साहसी महिला थीं कि एक बार एक क्रू मेंबर को बचाने के लिए चीते से लड़ पड़ी थीं, लेकिन वो तब टूट गईं, जब उन्होंने अपने जवान बेटे को खो दिया। दुर्गा तब भी नहीं रुकी और फिर पर्दे की सबसे फेमस मां बनीं।

आज 119वीं बर्थ एनिवर्सरी के खास मौके पर जानिए दादा साहेब फाल्के जीतने वालीं चौथी महिला दुर्गा खोटे की ट्रैजेडी से भरी बेहतरीन कहानी-

बात है 14 जनवरी 1905 की, गोवा के कोकंणी ब्राह्मण परिवार में पांडुरंग शामराव लाड और मंजुलाबाई के घर दुर्गा खोटे का जन्म हुआ था। जन्म के समय उन्हें वीटा लाड नाम दिया गया था, जिनकी परवरिश कांदेवाड़ी के एक समृद्ध परिवार में हुई। गुलाम भारत के उस दौर में लड़कियों की या तो कम उम्र में ही शादी करवा दी जाती थी या उन्हें घर की चार दीवारी के भीतर पर्दे में रखा जाता था। हालांकि, इज्जतदार और रईस खानदान से ताल्लुक रखने वालीं दुर्गा को पढ़ाई की आजादी थी।

कैथेड्रेल हाई स्कूल से स्कूलिंग पूरी करने के बाद दुर्गा ने सेंट जेवियर कॉलेज से BA की डिग्री हासिल करने के लिए दाखिला लिया था। पढ़ाई पूरी होती कि उससे पहले ही उनकी शादी खोटे परिवार के इकलौते बेटे विश्वनाथ खोटे से करवा दी गई। विश्वनाथ एक मैकेनिकल इंजीनियर थे, जिन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी। अपर मिडिल क्लास वाले खोटे परिवार में ज्यादातर लोग मॉडर्न और अंग्रेजी बोलने वाले थे, जिनके पूर्वज बैंकर हुआ करते थे। टीनएज में हुई शादी के बाद दुर्गा खोटे ने अपनी BA डिग्री हासिल की और फिर घर गृहस्थी में लग गईं।

जब दुर्गा ने 2 बेटों बकुल और हरिन को जन्म दिया, तो उनका परिवार संपन्न हो गया। दोनों खुशी-खुशी जिंदगी गुजार रहे थे कि अचानक एक हादसे में दुर्गा के पति विश्वनाथ का निधन हो गया। महज 26 साल की उम्र में दुर्गा का हंसता-खेलता परिवार बिखर चुका था।

फिल्म पृथ्वी वल्लभ (1943) में सोहराब मोदी के साथ मृणालवति के रोल में दुर्गा खोटे।

फिल्म पृथ्वी वल्लभ (1943) में सोहराब मोदी के साथ मृणालवति के रोल में दुर्गा खोटे।

26 साल की उम्र में हुईं विधवा, ससुराल में रोज मिलते थे ताने

पति की मौत के बावजूद दुर्गा अपने दोनों बेटों के साथ ससुराल में ही रहीं। जब कुछ महीनों बाद उनके ससुर भी गुजर गए तो उनके परिवार का खर्च कुछ रिश्तेदार मिलकर उठाते थे। घर चलाने के खर्च के साथ दुर्गा के परिवार को ताने भी मिलते थे। इससे तंग आकर एक दिन दुर्गा ने खुद कमाने का फैसला किया।

ट्यूशन देती थीं, बहन की मदद से मिला फिल्मों में काम

पढ़ी-लिखी थीं तो वो आस-पड़ोस के बच्चों को घर बुलाकर ट्यूशन देने लगीं। इसी बीच दुर्गा की बहन शालिनी ने उन्हें बताया कि प्रभास फिल्म कंपनी में काम करने वाले उनके दोस्त जे.बी.एच. वाडिया को फिल्ल फरेबी जाल के लिए अंग्रेजी बोलने वाली लड़की की तलाश है। ये रोल पहले शालिनी को ही मिला था, लेकिन उन्होंने अपनी बहन के नाम का सुझाव दे दिया।

फिल्मों में काम मिला तो समाज और परिवार ने किया विरोध

उस जमाने में पढ़ी-लिखी और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली लड़कियां सिर्फ विदेशी ही हुआ करती थीं। तो दुर्गा को ये रोल आसानी से मिल गया। ब्राह्मण परिवार की विधवा दुर्गा को जब फिल्म में काम मिला, तो परिवार और समाज ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। इसकी दो वजह थीं, पहली कि वो एक इज्जतदार खानदान से थीं और सिनेमा में काम करना एक असभ्य पेशा माना जाता था, जिसकी तुलना वैश्यावृत्ति से होती थी और दूसरा कारण था उनका विधवा होना। समाज के विरोध के बावजूद दुर्गा ने अपने बेटों और आर्थिक तंगी खत्म करने के लिए फिल्मों में काम किया। पहली फिल्म के बाद दुर्गा सिनेमा से दूरी बनाना चाहती थीं, लेकिन वी.शांताराम के कहने पर उन्होंने काम करना जारी रखा।

1945 की फिल्म फूल में मजहर खान के साथ दुर्गा खोटे।

1945 की फिल्म फूल में मजहर खान के साथ दुर्गा खोटे।

क्रू मेंबर को बचाने के लिए चीते से भिड़ गई थीं

प्रभात फिल्म कंपनी प्रोडक्शन की दूसरी फिल्म माया मछिंद्र में दुर्गा खोटे ने रानी का रोल प्ले किया, जिसका पालतू जानवर चीता था। फिल्म की शूटिंग महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुई थी। शूटिंग के दौरान सेट पर कई चीते लाए गए थे, जिनके साथ उनकी ट्रेनर भी सेट पर मौजूद रहती थीं। एक दिन सेट पर ट्रेनर का ध्यान हटने से एक चीता बेकाबू हो गया और एक क्रू मेंबर पर झपट पड़ा। ये देखते ही दुर्गा ने बिना अपनी जान की परवाह किए, सीधे चीते पर झपट पड़ीं और उस पर काबू पाया। दुर्गा का साहस देखकर सेट पर हर कोई उनकी वाहवाही कर रहा था।

फिल्म माया मछिंद्र, दुर्गा खोटे की दूसरी फिल्म थी, जिसे वी. शांताराम ने डायरेक्ट किया था।

फिल्म माया मछिंद्र, दुर्गा खोटे की दूसरी फिल्म थी, जिसे वी. शांताराम ने डायरेक्ट किया था।

मराठी सिनेमा की पहली बोलती फिल्म में काम कर स्टार बनी थीं दुर्गा

फिल्म फरेबी जाल और माया मछिंद्रा के बाद आखिरकार दुर्गा खोटे को वो मौका मिला, जिसका उन्हें इंतजार था। वो प्रभात फिल्म कंपनी 1932 की पहली साउंड फिल्म आयोध्या चा राजा में बतौर हीरोइन नजर आईं। ये मराठी सिनेमा की पहली बोलती फिल्म थी। फिल्म मराठी और हिंदी भाषा में बनाई गई थी, जिससे ये भारत की पहली दो भाषाओं में बनी फिल्म भी है। ये फिल्म दुर्गा खोटे और भारतीय सिनेमा के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई। ब्राह्मण रईस परिवार की दुर्गा के बाद से ही अपर क्लास की महिलाओं के लिए भारतीय सिनेमा के रास्ते खुले।

भारतीय सिनेमा की पहली फ्रीलांस एक्ट्रेस थीं दुर्गा खोटे

दुर्गा खोटे को फिल्मों में लाने का क्रेडिट प्रभात फिल्म कंपनी को दिया जाता है। सिनेमा के शुरुआती दौर में सभी कलाकारों को कॉन्ट्रैक्ट के तहत प्रोडक्शन कंपनी से जोड़ा रखा जाता था। प्रोडक्शन कंपनियां कलाकारों से कुछ निर्धारित सालों का कॉन्ट्रैक्ट साइन करवाती थी। ऐसे में वो कलाकार उस समय पर किसी दूसरे प्रोडक्शन के साथ काम नहीं कर सकते थे, लेकिन दुर्गा खोटे ने ये ट्रेंड तोड़ दिया। प्रभात कंपनी के साथ मंथली सैलेरी पर काम करते हुए उन्होंने स्पेशल कॉन्ट्रैक्ट के तहते न्यू थिएटर कंपनी, ईस्ट इंडिया फिल्म कंपनी और प्रकाश पिक्चर्स के साथ भी किया। ऐसे में वो इंडियन सिनेमा की पहली फ्रीलांस एक्ट्रेस बनीं।

दुर्गा खोटे क्लासिकल सिनेमा की इकलौती एक्ट्रेस हैं, जो मर्सडीज बेंज के इश्तिहार में नजर आई हैं।

दुर्गा खोटे क्लासिकल सिनेमा की इकलौती एक्ट्रेस हैं, जो मर्सडीज बेंज के इश्तिहार में नजर आई हैं।

फिल्म प्रोड्यूस और डायरेक्ट करने वाली पहली इंडियन एक्ट्रेस हैं

1936 की फिल्म अमर ज्योति में दुर्गा खोटे ने समुद्री डाकू सौदामिनी का बेहतरीन रोल निभाया। ये पहली भारतीय फिल्म है, जिसका प्रीमियर वेनिस फिल्म फेस्टिवल में हुआ था। इसके बाद दुर्गा ने 1937 की फिल्म साथी प्रोड्यूस और डायरेक्ट की। एक साथ ये दो काम करने वालीं दुर्गा पहली एक्ट्रेस थीं।

जवान बेटे को खोकर बनीं सिनेमा की मशहूर मां

उनका बड़ा बेटा हरिन महज 40 साल का था, जब उसका अचानक निधन हो गया। बेटे की मौत का सदमा दुर्गा खोटे के लिए झकझोर देने वाला था। उन्होंने अपने बेटे की मौत के बाद फिल्मों से ब्रेक लिया था। हरिन अपने पीछे एक विधवा विजया और दो छोटे बच्चे छोड़ गए थे। दुर्गा ने खुद उनकी जिम्मेदारी उठाई और कुछ समय बाद उन्होंने विजया की दूसरी शादी करवा दी। विजया आज एक मशहूर मराठी फिल्ममेकर हैं।

बढ़ती उम्र और ढलते शरीर के साथ दुर्गा ने कुछ समय बाद बतौर कैरेक्टर आर्टिस्ट काम करना शुरू कर दिया। फिल्म मुगल-ए-आजम में जोधा बाई का किरदार हो, बॉबी में डिंपल की दादी का रोल हो, अभिमान में आंटी का रोल हो या बिदाई में मां का रोल हो। इन सभी फिल्मों से दुर्गा खोटे ने अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी है।

करीब 200 फिल्मों का हिस्सा रहीं दुर्गा खोटे ने 80 के दशक में प्रोडक्शन में ध्यान दिया और कई बेहतरीन शॉर्ट फिल्में और डॉक्यूमेंट्रीज बनाईं। दूरदर्शन के मशहूर शो वागले की दुनिया को दुर्गा खोटे ने ही प्रोड्यूस किया था।

1954 की फिल्म मिर्जा गालिब में सुरैया के साथ दुर्गा खोटे।

1954 की फिल्म मिर्जा गालिब में सुरैया के साथ दुर्गा खोटे।

कई ख्वाहिशें रह गईं अधूरी

जिंदगी के आखिरी दौर में दुर्गा खोटे ने मराठी भाषा में अपनी आत्मकथा मी दुर्गा खोटे लिखी थी। कुछ सालों बाद 1990 में इसे इंग्लिश में आई दुर्गा खोटे नाम से ट्रांसलेट किया गया था। अपनी बायोग्राफी में दुर्गा खोटे ने अपनी कई अधूरी ख्वाहिशों का जिक्र किया था। एक हिस्से में उन्होंने लिखा था, मेरे मिशन तो बहुत हैं, लेकिन अब ताकत नहीं बची है। अब मेरी उम्र 85 साल हो चुकी है। अब कुछ करने की हिम्मत नहीं रही। ख्वाहिशें तो बहुत हैं, हर वक्त जहन में कल्पनाएं आती हैं, लेकिन कुछ कर नहीं सकती।

बायोग्राफी लिखने के बाद दुर्गा खोटे मुंबई के करीब अलीबाग में रहने चली गईं। अगले ही साल 22 सितंबर 1991 को दुर्गा का 86 साल की उम्र में निधन हो गया।

फिल्म मुगल-ए-आजम में दुर्गा खोटे ने सलीम उर्फ दिलीप कुमार की मां का रोल प्ले किया था।

फिल्म मुगल-ए-आजम में दुर्गा खोटे ने सलीम उर्फ दिलीप कुमार की मां का रोल प्ले किया था।

दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड जीतने वाली चौथी महिला हैं दुर्गा खोटे

भारतीय सिनेमा में 50 सालों तक दिए गए दुर्गा खोटे के योगदान के लिए उन्हें कई अवॉर्ड और सम्मान दिए गए। साल 1942 और 1943 में उन्हें फिल्म चरणों की दासी और भरत मिलाप के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का BFJA (बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन) अवॉर्ड दिया गया था। इसके बाद उन्हें 1958 में संगीत नाटक एकेडमी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

1968 में दुर्गा खोटे को पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था। वहीं फिल्म बिदाई के लिए फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का अवॉर्ड दिया गया था। 1983 में उन्हें दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। वो ये सम्मान हासिल करने वालीं भारत की चौथी महिला हैं।

भारतीय सिनेमा का हिस्सा रही हैं दुर्गा की 3 पीढ़ियां

दुर्गा खोटे ने न सिर्फ महिलाओं के लिए सिनेमा में जगह बनाना आसान किया बल्कि वो अपने कई रिश्तेदारों के लिए भी प्रेरणा बनीं। उनके दिवंगत पति विश्वनाथ खोटे के भाई नंदू खोटे भी साइलेंट फिल्मों के एक्टर रहे थे। नंदू के बेटे वीजू खोटे और बेटी शुभा खोटे भी इंडियन सिनेमा का जाना-पहचाना नाम हैं। वीजू खोटे ने फिल्म शोले में कालिया का यादगार रोल प्ले किया था। वहीं शुभा खोटे ने 1955 की फिल्म सीमा से फिल्मों में जगह बनाई।

दुर्गा खोटे के भतीजे विजू खोटे।

दुर्गा खोटे के भतीजे विजू खोटे।

शुभा खोटे की बेटी भावना बालसावर भी मशहूर टीवी शोज देख भाई देख, जुबान संभालकर जैसे शोज का हिस्सा रही हैं।

दुर्गा खोटे की भतीजी शुभा खोटे, बेटी भावना के साथ।

दुर्गा खोटे की भतीजी शुभा खोटे, बेटी भावना के साथ।

आज भी जब कभी इंडियन सिनेमा के इतिहास की सबसे मशहूर मां का जिक्र होता है, तो दुर्गा खोटे का नाम उसमें जरूर शामिल किया जाता है।

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